थाल सजाकर किसे पूजने चले
प्रात ही मतवाले,
कहा चले तुम राम नाम का
पीताम्बर तन पर डाले|
इधर प्रयाग न गंगा सागर इधर
न रामेश्वर काशी,
इधर कहा है तीर्थ तुम्हारा
कहा चले तुम सन्यासी|
चले झूमते मस्ती से क्या
तुम अपना पथ आये भूल,
कहा तुम्हारा दीप जलेगा कहा
चढ़ेगा माला फूल|
मुझे न जाना गंगा सागर मुझे
न रामेश्वर काशी,
तीर्थराज चित्तौड़ देखने को
मेरी आँखे प्यासी|
अपने अटल स्वतंत्र दुर्ग पर
सुनकर वैरी की बोली,
निकल पड़ी लेकर तलवारें जहाँ
जवानों की टोली|
जहाँ आन पर माँ बहनों ने
जल-जला पवन होली,
वीर मंडली गर्वित स्वर में
जय माँ की जय-जय बोली|
सुन्दरियों ने जहाँ देश हित
जौहर व्रत करना सीखा,
स्वतंत्रता के लिए जहाँ पर
बच्चों ने भी मरना सीखा|
वही जा रहा पूजा करने लेने
सतियों की पद धूल,
वही हमारा दीप जलेगा वही
चढेगा माला फूल|
जहाँ पदमिनी जौहर व्रत करती
चढ़ी चिता की ज्वाला पर,
क्षण भर वही समाधी लगी बैठ
इसी मृग छाला पर|
श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा
रचित