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14 फ़रवरी 2012

पथ मेरा आलोकित कर दो


पथ मेरा आलोकित कर दो ।
नवल प्रात की नवल रश्मियों से
मेरे उर का तम हर दो ।।

मैं नन्हा सा पथिक विश्व के
पथ पर चलना सीख रहा हूँ,
मैं नन्हा सा विहग विश्व के
नभ में उड़ना सीख रहा हूँ ।

पहुँच सकूं निर्दिष्ट लक्ष्य तक
मुझको ऐसे पग दो पर दो ।।

पाया जग से जितना जब तक
और अभी जितना मैं पाऊँ,
मनोकामना है यह मेरी
उससे अधिक कहीं दे जाऊं ।

धरती को ही स्वर्ग बनाने का
मुझको मंगलमय वर दो ।।

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी द्वारा रचित

6 टिप्‍पणियां:

  1. नव आशा का संचार करता मनमोहक गीत द्वारिका जी का ... आभार पढवाने का ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर...........

    सांझा करने का शुक्रिया
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रेरक प्रस्तुति.
    सीखना और परहित की चाहत करना
    ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए.

    उत्तर देंहटाएं

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