Pages

6 मई 2013

बुद्धि का फल

एक रोज की बात है कि बादशाह अकबर के दरबार में लंका के राजा का एक दूत पहुँचा | उसने बादशाह अकबर से एक नयी तरह की माँग करते हुए कहा –“ आलमपनाह ! आपके दरबार में एक से बढ़कर एक बुद्धिमान , होशियार तथा बहादुर दरबारी मौजूद हैं | हमारे महाराज ने आपके पास मुझे एक घड़ा भरकर बुद्धि लाने के लिए भेजा है | हमारे महाराज को आप पर पूरा भरोसा है कि आप उसका बन्दोबस्त किसी-न-किसी तरह और जल्दी ही कर देंगे |”

यह सुनकर बादशाह अकबर चकरा गए |

उन्होंने अपने मन में सोंचा – “ क्या बेतुकी माँग है , भला घड़े भर बुद्धि का बन्दोबस्त कैसे किया जा सकता है ? लगता है | लंका का राजा हमारा मजाक बनाना चाहता है , कहीं वह इसमें सफल हो गया तो ...?

तभी बादशाह को बीरबल का ध्यान आया , वे सोचने लगे कि शायद यह कार्य बीरबल के वश का भी न हो, मगर उसे बताने में बुराई ही क्या है ?

जब बीरबल को बादशाह के बुलवाने का कारण ज्ञात हुआ तो वह मुस्कराते हुए कहने लगे – “ आलमपनाह ! चिन्ता की कोई बात नहीं , बुद्धि की व्यवस्था हो जाएगी , लेकिन इसमें कुछ हफ्ते का वक़्त लग सकता है |” 
बादशाह अकबर बीरबल की इस बात पर कहते भी तो क्या , बीरबल को मुँह माँगा समय दे दिया गया |

बीरबल ने उसी दिन शाम को अपने एक खास नौकर को आदेश दिया – “ छोटे मुँह वाले कुछ मिट्टी के घड़ों की व्यवस्था करो |”

नौकर ने फ़ौरन बीरबल की आज्ञा का पालन किया |

घड़े आते ही बीरबल अपने नौकर को लेकर कददू की एक बेल के पास गए | उन्होंने नौकर से एक घड़ा ले लिया , बीरबल ने घड़े को एक कददू के फूल पर उल्टा लटका दिया , इसके बाद उन्होंने सेवक को आदेश दिया कि बाकि सारे घड़ों को भी इसी तरह कददू के फूल पर उल्टा रख दें |

बीरबल ने इस काम के बाद सेवक को इन घड़ों की देखभाल सावधानीपूर्वक करते रहने का हुक्म दिया और वहाँ से चले गए |

बादशाह अकबर ने कुछ दिन बाद इसके बारें में पूछा , तो बीरबल ने तुरन्त उत्तर दिया – “ आलमपनाह ! इस कार्य को हो चुका समझें , बस दो सप्ताह का समय और चाहिए , उसके बाद पूरा घड़ा बुद्धि से लबालब भर जायेगा |”

बीरबल ने पन्द्रह दिन के बाद घड़ों के स्थान पर जाकर देखा कि कददू के फल घड़े जितने बड़े हो गए हैं , उन्होंने नौकर की प्रशंसा करते हुए कहा – “तुमने अपनी जिम्मेदारी बड़ी कुशलतापूर्वक निभायी है , इसके लिए हम तुम्हे इनाम देंगे |”

इसके बाद बीरबल ने लंका के दूत को बादशाह अकबर के दरबार में बुलाया और उसे बताया कि बुद्धि का घड़ा लगभग तैयार है | और बीरबल ने तुरन्त ताली बजाई , ताली की आवाज सुनकर बीरबल का सेवक एक बड़ी थाली में घड़ा लिए हुए बड़ी शान से दरबार में हाज़िर हुआ |

बीरबल ने घड़ा उठाया और उसे लंका के दूत के हाथ में सौंपते हुए कहा – “ लीजिए श्रीमान आप इसे अपने महाराज को भेंट कर दीजिए , लेकिन एक बात अवश्य ध्यान रखियेगा कि खाली होने पर हमारा यह कीमती बर्तन हमें जैसा-का –तैसा वापस मिल जाना चाहिए | इसमें रखा बुद्धि का फल तभी प्रभावशाली होगा जब इस बर्तन को कोई नुकसान न पहुँचे |

इस पर दूत ने कहा –“ हुजूर ! क्या मैं भी इस बुद्धि के फल को देख सकता हूँ |”
“हाँ ..हाँ जरुर |” बीरबल ने गर्दन हिलाते हुए कहा |

घड़े देखकर परेशान होते हुए दूत ने मन-ही–मन सोंचा –“हमारी भी मति मारी गई है | भला हमें भी क्या सूझी , बीरबल का कोई जवाब नहीं है ....भला ऐसी बात मैंने सोची कैसे ?” 

घड़ा लेकर दूत के जाते ही बादशाह अकबर ने भी घड़े को देखने की इच्छा प्रकट की | और बीरबल ने एक घड़ा मँगवा दिया |

जैसे ही उन्होंने घड़े में झाँका उन्हें हँसी आ गयी | वे बीरबल की पीठ ठोकते हुए बोले –“ मान गए भई ! तुमने बुद्धि का क्या शानदार फल पेश किया है , लगता है इसे पाकर लंका के राजा के बुद्धिमान होने में तनिक भी देर नहीं लगेगी |”

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !बुद्धि और ज्ञान योग का सुफल !बहुत खूब प्रसंग है बीरबल अकबर के किस्सों का .माया रावण के निर्बुद्ध होने का .

    उत्तर देंहटाएं

Thanks for Comment !

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...