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24 अगस्त 2012

स्वर्ग और नरक

एक युवक था| वह बन्दूक और तलवार चलाना सीख रहा था| इसलिए वह यदा-कदा जंगल जाकर खरगोश, लोमड़ी और पक्षियों का शिकार करता| शिकार करते-करते उसे यह घमंड हो गया कि उसके जैसा निशानेबाज कोई नहीं है और न उसके जैसा कोई तलवार चलाने वाला| आगे चलकर वह इतना घमंडी हो गया कि किसी बड़े कि प्रति शिष्टाचार भी भूल गया| उसके गाँव के बाहर कुटिया में एक संत रहते थे| वह एक दिन उनके पास पहुँचा| न उन्हें प्रणाम किया और न ही उन्हें अपना परिचय दिया| सीधे उनके सामने पड़े आसन पर बैठ गया और कहने लगा, “लोग बेकार में स्वर्ग-नरक में विश्वास करते हैं|”

संत ने उससे पूछा, “तुम तलवार साथ में क्यों रखते हो ?”
उसने कहा, ‘मुझे सेना में भर्ती होना है ,कर्नल बनना है|’
इस पर संत ने कहा, ‘तुम्हारे जैसे लोग सेना में भर्ती किये जाते हैं ? पहले अपनी शक्ल शीशे में जाकर देख लो|’

यह सुनते ही युवक गुस्से में आ गया और उसने म्यान से तलवार निकल ली| तब संत ने फिर कहा, “वाह ! तुम्हारी तलवार भी कैसी है ? इससे तुम किसी भी बहादुर आदमी का सामना नहीं कर सकते, क्योकि वीरों कि तलवार की चमक कुछ और ही होती है|”

फिर तो युवक गुस्से से आग-बबूला हो गया और संत को मारने के लिए झपटा| तब संत ने शांत स्वर से कहा, “अब तुम्हारे लिए नरक की दरवाजा खुल गया है|”

यह सुनते ही युवक की अक्ल खुल गयी और उसने तलवार म्यान में रख ली| अब वह सर झुकाकर संत के सामने खड़ा था और अपराधी जैसा भाव दिखा रहा था| इस पर संत ने कहा, “अब तुम्हारे लिए स्वर्ग का दरवाजा खुल गया है|”

4 टिप्‍पणियां:

  1. 'स्वर्ग' अथवा 'नरक' में प्रवेश लेना मन के भावों पर निर्भर है.
    संतप्त या संकीर्ण करने वाले भाव नरक-द्वार में सहजता से प्रवेश दिलाते हैं और
    दीप्त या विस्तृत करने वाले भाव स्वर्ग के अलौकिक सुख तक की अनुभूति करा देते हैं.

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